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कहीं सलीब कहीं कर्बला नज़र आए | शाही शायरी
kahin salib kahin karbala nazar aae

ग़ज़ल

कहीं सलीब कहीं कर्बला नज़र आए

अमीर क़ज़लबाश

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कहीं सलीब कहीं कर्बला नज़र आए
जिधर निगाह उठे ज़ख़्म सा नज़र आए

बुझी है प्यास ज़मीं की तो ये तपिश क्यूँ है
वो अब्र है तो बरसता हुआ नज़र आए

बजा है अपनी अक़ीदत मगर सवाल ये है
वो आदमी हो तो क्यूँकर ख़ुदा नज़र आए

चलो कि घेर लें उस को लहू लहू चेहरे
हर एक सम्त उसे आइना नज़र आए

हमीं ने तन से जुदा कर लिया है सर अपना
बस एक हम थे जो सब से जुदा नज़र आए

कहाँ कहाँ अभी इमकान-ए-ज़ि़ंदगी है 'अमीर'
धुआँ छटे तो कोई रास्ता नज़र आए