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कहाँ है तू कहाँ है और मैं हूँ | शाही शायरी
kahan hai tu kahan hai aur main hun

ग़ज़ल

कहाँ है तू कहाँ है और मैं हूँ

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

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कहाँ है तू कहाँ है और मैं हूँ
अनल-हक़ का बयाँ है और मैं हूँ

लब-ए-जाँ-बख़्श-ए-जानाँ का हूँ कुश्ता
हयात-ए-जाविदाँ है और मैं हूँ

विसाल-ए-दाइमी का है तसव्वुर
बहार-ए-बे-ख़िज़ाँ है और मैं हूँ

नहीं हर इक को इस मयख़ाने में बार
बस इक पीर-ए-मुग़ाँ है और मैं हूँ

मज़ा देता है तन्हाई में रोना
कि इक दरिया रवाँ है और मैं हूँ

उठा दो दिन को और शब को ब-दस्तूर
ये संग-ए-आस्ताँ है और मैं हूँ

तहम्मुल की नहीं अब ताब ज़िन्हार
नबर्द-ए-आसमाँ है और मैं हूँ

गुल-ए-गुलचीं कहाँ फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ में
पुराना आशियाँ है और मैं हूँ

शब-ए-हिज्राँ में हो कौन और दम-साज़
फ़क़त इक क़िस्सा-ख़्वाँ है और मैं हूँ

विलायत का सफ़र मुश्किल है 'नाज़िम'
यही हिन्दोस्ताँ है और मैं हूँ