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कह गया कुछ तो ज़ेर-ए-लब कोई | शाही शायरी
kah gaya kuchh to zer-e-lab koi

ग़ज़ल

कह गया कुछ तो ज़ेर-ए-लब कोई

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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कह गया कुछ तो ज़ेर-ए-लब कोई
जान देता है बे-सबब कोई

जावे क़ासिद उधर तो ये कहियो
राह तकता है रोज़ ओ शब कोई

गो कि आँखों में अपनी आवे जान
मुँह दिखाता है हम को कब कोई

बन गया हूँ मैं सूरत-ए-दीवार
सामने आ गया है जब कोई

गरचे हम साए उस परी के रहे
न मिला झाँकने का ढब कोई

हद ख़ुश आया ये शेर-ए-'मीर' मुझे
कर के लाया था मुंतख़ब कोई

अब ख़ुदा मग़फ़िरत करे उस की
'मीर' मरहूम था अजब कोई

ऐ फ़लक उस को तू ग़नीमत जान
'मुसहफ़ी' सा नहीं है अब कोई