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कभी टूटा न अफ़्सून-ए-सितम तेरी हुज़ूरी का | शाही शायरी
kabhi TuTa na afsun-e-sitam teri huzuri ka

ग़ज़ल

कभी टूटा न अफ़्सून-ए-सितम तेरी हुज़ूरी का

ऐन सलाम

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कभी टूटा न अफ़्सून-ए-सितम तेरी हुज़ूरी का
बहुत नज़दीक रह कर भी रहा एहसास-ए-दूरी का

कहाँ तक साथ देगी देखें अपनी बे-नियाज़ी भी
ख़ुमार-ए-तिश्नगी ख़म्याज़ा है दश्त-ए-सुबूरी का

हज़ारों आफ़्ताबों के लहू से तमतमाता है
भरम इक मुस्कुराते चेहरा-ए-ज़ेबा की नूरी का

हुज़ूर इरशाद अपना मेरी आँखों में बसा दीजे
कि फिर शाकी न हो कोई बयाँ मंज़र से दूरी का

ये महरूमी तो अपनी बेबसी ही की मुकाफ़ी है
सिला कुछ और होना चाहिए था ना-सुबूरी का

मोहब्बत ख़ुद-फ़रामोशी से गुज़री अब ये आलम है
कि इक आलम तमाशाई है अपनी बे-शुऊरी का