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कभी नुमायाँ कभी तह-नशीं भी रहते हैं | शाही शायरी
kabhi numayan kabhi tah-nashin bhi rahte hain

ग़ज़ल

कभी नुमायाँ कभी तह-नशीं भी रहते हैं

अब्दुल अहद साज़

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कभी नुमायाँ कभी तह-नशीं भी रहते हैं
यहीं पे रहते हैं हम और नहीं भी रहते हैं

भटकती नज़रों में हैं मुर्तकिज़ निगाहें भी
गुमाँ-कदों में कुछ अहल-ए-यक़ीं भी रहते हैं

अगरचे हम को मुक़द्दम है राह-ए-ख़िदमत-ए-ख़लक़
जो बाज़ आए तो अपने तईं भी रहते हैं

बजा शवाहिद ओ मंतिक़ क़ुबूल बहस ओ दलील
प हम ख़ता-ए-नज़र के क़रीं भी रहते हैं

हिजाब फ़िक्र-ओ-नज़र के उठा के देखो तो
हमारे फ़न में कई नाज़नीं भी रहते हैं

शबाहतें सी ग़ुबार-ए-हद-ए-निगाह में हैं
पस-ए-फ़लक कहीं अहल-ए-ज़मीं भी रहते हैं

तुम अपने ठोर-ठिकानों को याद रक्खो 'साज़'
हमारा क्या है कि हम तो कहीं भी रहते हैं