EN اردو
कभी गेसू न बिगड़े क़ातिल के | शाही शायरी
kabhi gesu na bigDe qatil ke

ग़ज़ल

कभी गेसू न बिगड़े क़ातिल के

रशीद लखनवी

;

कभी गेसू न बिगड़े क़ातिल के
नाज़-बरदार हैं मिरे दिल के

मुझ को अग़्यार से भी उल्फ़त है
कि ये कुश्ते हैं मेरे क़ातिल के

उठे जाते हैं बज़्म-ए-आलम से
आने वाले तुम्हारी महफ़िल के

उन के दर तक पहुँच के मरता हूँ
डूबता हूँ क़रीब साहिल के

दाग़-ए-दिल घुट रहे हैं पीरी में
बुझ रहे हैं चराग़ महफ़िल के

है मुसाफ़िर-नवाज़ तेग़ तिरी
मुझ को रुख़्सत किया गले मिल के

ऐ 'रशीद' 'उन्स' तक थे हम शाइ'र
हो गए ख़ाक हौसले दिल के