कभी अज़ाब कभी एक ताज़ियाना है
हमारा दूर गुज़िश्ता का शाख़साना है
बस एक वादा-ए-फ़र्दा पे लोग ज़िंदा हैं
बस एक लम्हा-ए-मौजूद आब-ओ-दाना है
तनाज़ुरात यहाँ तो बदलते रहते हैं
तुम्हारा नेक रवय्या भी मुजरिमाना है
अब ऐसी धुँद में मुझ को दिखाई क्या देगा
है बस में तीर न क़ाबू में वो निशाना है
वो संग-ए-राह भी ताज़ा हवा का झोंका भी
कभी क़याम कभी हर तरफ़ रवाना है
ग़ज़ल
कभी अज़ाब कभी एक ताज़ियाना है
जावेद नासिर

