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कभी अज़ाब कभी एक ताज़ियाना है | शाही शायरी
kabhi azab kabhi ek taziyana hai

ग़ज़ल

कभी अज़ाब कभी एक ताज़ियाना है

जावेद नासिर

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कभी अज़ाब कभी एक ताज़ियाना है
हमारा दूर गुज़िश्ता का शाख़साना है

बस एक वादा-ए-फ़र्दा पे लोग ज़िंदा हैं
बस एक लम्हा-ए-मौजूद आब-ओ-दाना है

तनाज़ुरात यहाँ तो बदलते रहते हैं
तुम्हारा नेक रवय्या भी मुजरिमाना है

अब ऐसी धुँद में मुझ को दिखाई क्या देगा
है बस में तीर न क़ाबू में वो निशाना है

वो संग-ए-राह भी ताज़ा हवा का झोंका भी
कभी क़याम कभी हर तरफ़ रवाना है