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कभी अहल-ए-मोहब्बत यूँ न ख़ौफ़-ए-जिस्म-ओ-जाँ करते | शाही शायरी
kabhi ahl-e-mohabbat yun na KHauf-e-jism-o-jaan karte

ग़ज़ल

कभी अहल-ए-मोहब्बत यूँ न ख़ौफ़-ए-जिस्म-ओ-जाँ करते

आजिज़ मातवी

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कभी अहल-ए-मोहब्बत यूँ न ख़ौफ़-ए-जिस्म-ओ-जाँ करते
अगर शैख़-ओ-बरहमन जश्न-ए-नाक़ूस-ओ-अज़ाँ करते

नवाज़िश काश मुझ पर इतनी मेरे मेहरबाँ करते
कभी दिल की तसल्ली के लिए भूले से हाँ करते

हमारे जज़्बा-ए-तामीर से होते अगर वाक़िफ़
तो सदियों बर्क़ के शो'ले तवाफ़-ए-आशियाँ करते

फ़सुर्दा यूँ न होते ग़ुंचा-ओ-गुल मौसम-ए-गुल में
अगर दिल से चमन की आबियारी बाग़बाँ करते

नवेद-ए-फ़स्ल-ए-गुल आते हैं दिल अपना तड़प उट्ठा
असीर-ए-ग़म हैं वर्ना हम भी सैर-ए-गुलिस्ताँ करते

फ़ज़ा-ए-साहिल-ए-उम्मीद अगर कुछ रास आ जाती
तो हम क्यूँ नज़्र-ए-तूफ़ाँ कश्ती-ए-उम्र-ए-रवाँ करते

हमें भी मिल गई होती सनद मंज़िल-शनासी की
सलीक़े से अगर तक़लीद मीर-ए-कारवाँ करते

कभी बाद-ए-सबा बन कर कभी जारूब-कश हो कर
तमन्ना थी मुसलसल हम तवाफ़-ए-आस्ताँ करते

था चुप रहना ही बेहतर उन की बज़्म-ए-नाज़ में 'आजिज़'
कोई ग़म-आश्ना होता तो शरह-ए-दास्ताँ करते