EN اردو
काम कुछ तो लेना था अपने दीदा-ए-तर से | शाही शायरी
kaam kuchh to lena tha apne dida-e-tar se

ग़ज़ल

काम कुछ तो लेना था अपने दीदा-ए-तर से

असग़र मेहदी होश

;

काम कुछ तो लेना था अपने दीदा-ए-तर से
काट दीं कई रातें आँसुओं के ख़ंजर से

नींद है थकन सी है सिलवटें हैं यादें हैं
कितने लोग उठेंगे सुब्ह मेरे बिस्तर से

जान-बूझ कर हम ने बादबान खोले हैं
किस को अब पलटना है बे-कराँ समुंदर से

भीगना मुज़िर तो था फिर भी कैसी लज़्ज़त थी
जब घटाएँ उट्ठीं थीं मैं क़रीब था घर से

आज तो हवा भी है तेज़ बर्फ़-बारी भी
यूँ भी नींद क्या आती इक शिकस्ता चादर से

जब भी पाएँगे मौक़ा' फूल तोड़ ही लेंगे
बच्चे रुक नहीं सकते बाग़बान के डर से

ऐ नशात के ज़ीनो तुम को याद तो होगा
इक सलाम कह देना उस मदीना-अख़्तर से