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जूँ ही ज़ंजीर के पास आए पाँव | शाही शायरी
jun hi zanjir ke pas aae panw

ग़ज़ल

जूँ ही ज़ंजीर के पास आए पाँव

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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जूँ ही ज़ंजीर के पास आए पाँव
देख उस को मिरे थर्राए पाँव

ख़त का लाया न उधर से वो जवाब
यूँही क़ासिद के मैं थकवाए पाँव

बद-गुमानी न हो आशिक़ की ज़ियाद
उस ने शब ग़ैर से दबवाए पाँव

हाथ से यार का दामन दे कर
हर तरफ़ फिरते हैं घबराए पाँव

नज्द का देख के सहरा-ए-वसीअ
आते ही क़ैस ने फैलाए पाँव

ख़ुश-ख़िरामी है सनम! तुझ पर ख़त्म
कब्क ओ तूती ने ये कब पाए पाँव

तू तो सोता रहा आशिक़ ने तिरे
रात भर आँखों से सहलाए पाँव

मुझ मुसाफ़िर के किसी ने हरगिज़
गर्म पानी से न धुल्वाए पाँव

'मुसहफ़ी' हम को तरब से क्या काम
बैठे हैं गोर में लटकाए पाँव