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जू-ए-ताज़ा किसी कोहसार-कुहन से आए | शाही शायरी
ju-e-taza kisi kohsar-e-kuhan se aae

ग़ज़ल

जू-ए-ताज़ा किसी कोहसार-कुहन से आए

रईस फ़रोग़

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जू-ए-ताज़ा किसी कोहसार-कुहन से आए
ये हुनर यूँ नहीं आता है जतन से आए

लोग नाज़ुक थे और एहसास के वीराने तक
वो गुज़रते हुए आँखों की जलन से आए

शहर-ए-गुल कासा-ए-दरवेश बना बैठा है
कोई शोअ'ला किसी जलते हुए बन से आए

दर्द की मौज-ए-सुबुक-सैर में बह जाऊँगा
चाहे वो जान से चाहे वो बदन से आए

सुब्ह के साथ अजब लज़्ज़त-ए-दरयूज़ा-गरी
रात-भर सोचते रहने की थकन से आए

ऐसे ज़ालिम हैं मिरे दोस्त कि सुनते ही नहीं
जब तलक ख़ून की ख़ुशबू न सुख़न से आए