जू-ए-कम-आब से इक तेज़ सा झरना हुआ मैं
तेरी जानिब हूँ रवाँ शोर मचाता हुआ मैं
मुझ से ख़ाली नहीं अब एक भी ज़र्रा है यहाँ
देख ये तंग ज़मीं और ये फैला हुआ मैं
देख कर वुसअत-ए-सहरा-ए-तपाँ लर्ज़ां हूँ
साहिल-ए-दीदा-ए-नमनाक पे ठहरा हुआ मैं
पा-ब-ज़ंजीर इधर तेज़ हुआ और उधर
ख़ाक के तख़्त पे सुल्तान सा बैठा हुआ मैं
कोई ख़ुर्शीद सा दुनिया पे चमकता हुआ तू
किसी दीवार से साया सा निकलता हुआ मैं
ग़ज़ल
जू-ए-कम-आब से इक तेज़ सा झरना हुआ मैं
रफ़ीक राज़

