EN اردو
जुनून-ए-दिल न सिर्फ़ इतना कि इक गुल पैरहन तक है | शाही शायरी
junun-e-dil na sirf itna ki ek gul pairahan tak hai

ग़ज़ल

जुनून-ए-दिल न सिर्फ़ इतना कि इक गुल पैरहन तक है

मजरूह सुल्तानपुरी

;

जुनून-ए-दिल न सिर्फ़ इतना कि इक गुल पैरहन तक है
क़द ओ गेसू से अपना सिलसिला दार-ओ-रसन तक है

मगर ऐ हम-क़फ़स कहती है शोरीदा-सरी अपनी
ये रस्म-ए-क़ैद-ओ-ज़िंदाँ एक दीवार-ए-कुहन तक है

कहाँ बच कर चली ऐ फ़स्ल-ए-गुल मुझ आबला-पा से
मिरे क़दमों की गुल-कारी बयाबाँ से चमन तक है

मैं क्या क्या जुरआ-ए-ख़ूँ पी गया पैमाना-ए-दिल में
बला-नोशी मिरी क्या इक मय-ए-साग़र शिकन तक है

न आख़िर कह सका उस से मिरा हाल-ए-दिल-ए-सोज़ाँ
मह-ए-ताबाँ कि जो उस का शरीक-ए-अंजुमन तक है

नवा है जावेदाँ 'मजरूह' जिस में रूह-ए-साअत हो
कहा किस ने मिरा नग़्मा ज़माने के चलन तक है