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जो शमशीर तेरी अलम देखते हैं | शाही शायरी
jo shamshir teri alam dekhte hain

ग़ज़ल

जो शमशीर तेरी अलम देखते हैं

आसिफ़ुद्दौला

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जो शमशीर तेरी अलम देखते हैं
तो वोहीं सर अपना क़लम देखते हैं

तुझे ग़ैर से जब बहम देखते हैं
न देखे कोई जो कि हम देखते हैं

जो चाहें कि लिक्खें कुछ अहवाल दिल का
तो हाथों को अपने क़लम देखते हैं

तो जल्दी से आवर न मेरे मसीहा
कोई दम को राह-ए-अदम देखते हैं

गली में बुतों की शब-ओ-रोज़ 'आसिफ़'
तमाशा ख़ुदाई का हम देखते हैं