जो नज़र आना सकें ऐसे भी मंज़र देखें
देखने वाले कभी अपने भी अंदर देखें
रंग के जिस्म छुएँ नूर के पैकर देखें
ख़्वाब की शहर-पनाहों में उतर कर देखें
वक़्त ने सब से बड़ा वार किया है हम पर
किस बुलंदी से गिराता है मुक़द्दर देखें
देखना ये है कि क्या रद्द-ए-अमल होता है
अपने हम-ज़ाद को पहलू से झटक कर देखें
इत्तिफ़ाक़ ऐसा भी इक रोज़ मयस्सर आए
दूर से अपने को हालात की ज़द पर देखें
दूर-उफ़्तादा जज़ीरा ही निकल आए कोई
उस की आँखों के समुंदर में उतर कर देखें
ग़ज़ल
जो नज़र आना सकें ऐसे भी मंज़र देखें
अतीक़ुल्लाह

