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जो नज़र आना सकें ऐसे भी मंज़र देखें | शाही शायरी
jo nazar aana saken aise bhi manzar dekhen

ग़ज़ल

जो नज़र आना सकें ऐसे भी मंज़र देखें

अतीक़ुल्लाह

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जो नज़र आना सकें ऐसे भी मंज़र देखें
देखने वाले कभी अपने भी अंदर देखें

रंग के जिस्म छुएँ नूर के पैकर देखें
ख़्वाब की शहर-पनाहों में उतर कर देखें

वक़्त ने सब से बड़ा वार किया है हम पर
किस बुलंदी से गिराता है मुक़द्दर देखें

देखना ये है कि क्या रद्द-ए-अमल होता है
अपने हम-ज़ाद को पहलू से झटक कर देखें

इत्तिफ़ाक़ ऐसा भी इक रोज़ मयस्सर आए
दूर से अपने को हालात की ज़द पर देखें

दूर-उफ़्तादा जज़ीरा ही निकल आए कोई
उस की आँखों के समुंदर में उतर कर देखें