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जो न नक़्द-ए-दाग़-ए-दिल की करे शोला पासबानी | शाही शायरी
jo na naqd-e-dagh-e-dil ki kare shola pasbani

ग़ज़ल

जो न नक़्द-ए-दाग़-ए-दिल की करे शोला पासबानी

मिर्ज़ा ग़ालिब

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जो न नक़्द-ए-दाग़-ए-दिल की करे शोला पासबानी
तो फ़सुर्दगी निहाँ है ब-कमीन-ए-बे-ज़बानी

मुझे उस से क्या तवक़्क़ो ब-ज़माना-ए-जवानी
कभी कूदकी में जिस ने न सुनी मिरी कहानी

यूँ ही दुख किसी को देना नहीं ख़ूब वर्ना कहता
कि मिरे अदू को या रब मिले मेरी ज़िंदगानी