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जो इस बरस नहीं अगले बरस में दे दे तू | शाही शायरी
jo is baras nahin agle baras mein de de tu

ग़ज़ल

जो इस बरस नहीं अगले बरस में दे दे तू

शहराम सर्मदी

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जो इस बरस नहीं अगले बरस में दे दे तू
ये काएनात मिरी दस्तरस में दे दे तू

सुकून चाहता हूँ मैं सुकून चाहता हूँ
खुली फ़ज़ा में नहीं तो क़फ़स में दे दे तू

ये क्या कि हर्फ़-ए-दुआ पे भी बर्फ़ जमने लगी
कोई सुलगता शरारा नफ़स में दे दे तू

मैं दोनों काम में मश्शाक़ हूँ मगर मुझ को
ज़रा तमीज़ तो इश्क़ ओ हवस में दे दे तू

उस एक शख़्स के साथ एक उम्र रह लूँ मैं
अगर ये साबित ओ सय्यार बस में दे दे तू