EN اردو
जो हमें चाहे उस के चाकिर हैं | शाही शायरी
jo hamein chahe uske chaakir hain

ग़ज़ल

जो हमें चाहे उस के चाकिर हैं

हसरत अज़ीमाबादी

;

जो हमें चाहे उस के चाकिर हैं
यार-ए-शातिर न बार-ए-ख़ातिर हैं

याद है हम से प्यार से कहना
तुझ से हम सब तरह से हाज़िर हैं

दिल उठावेंगे तुझ से ता-मक़्दूर
सब्र करने पे गो न क़ादिर हैं

यार ओ आशिक़ बहम मुआफ़िक़ हों
इत्तिफ़ाक़ ऐसे शाज़-ओ-नादिर हैं

वस्ल की बिन न आई कुछ तदबीर
हम से कम आशिक़ों में बद-बिर हैं

कुछ क़ुसूर अपनी बंदगी में नहीं
बंदगी से अगर मुक़स्सिर हैं

'हसरत' इश्क़-ए-बुताँ से माँग अमाँ
जितने हैं सब ये सख़्त काफ़िर हैं