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जितना तेरा हुक्म था उतनी सँवारी ज़िंदगी | शाही शायरी
jitna tera hukm tha utni sanwari zindagi

ग़ज़ल

जितना तेरा हुक्म था उतनी सँवारी ज़िंदगी

अज़्म शाकरी

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जितना तेरा हुक्म था उतनी सँवारी ज़िंदगी
अपनी मर्ज़ी से कहाँ हम ने गुज़ारी ज़िंदगी

मेरे अंदर इक नया ग़म रोज़ रख जाता है कौन
रफ़्ता रफ़्ता हो रही है और भारी ज़िंदगी

रूह की तस्कीन के सारे दरीचे खुल गए
दर्द के पहलू में जब आई हमारी ज़िंदगी

सिर्फ़ थी ख़ाना-बदोशी या मोहब्बत का जुनूँ
हिजरतें करता रहा इक शख़्स सारी ज़िंदगी

एक लफ़्ज़-ए-कुन कहा आबाद सन्नाटे हुए
आसमानों से ज़मीनों पर उतारी ज़िंदगी