जिस्म दीवार है दीवार में दर करना है
रूह इक ग़ार है इस ग़ार में घर करना है
एक ही क़तरा तो है अश्क-ए-नदामत का बहुत
कौन से दश्त-ओ-बयाबान को तर करना है
जलते रहना भी है दीवार पे फ़ानूस के बिन
बे-ज़ेरह मार्का-ए-बाद भी सर करना है
ख़ाक हो जाने पे ऐ ख़ाक-बसर क्यूँ हो ब-ज़िद
क्या तुम्हें दोश-ए-हवा पर भी सफ़र करना है
अब इन आँखों में वो दरिया कहाँ वो चश्मे कहाँ
चंद क़तरे हैं जिन्हें लाल-ओ-गुहर करना है
फ़तह-ए-गुलज़ार मुबारक हो मगर याद रहे
अभी ना-दीदा बयाबान भी सर करना है
कुछ तो है रंग सा एहसास के पर्दे में निहाँ
जिस को मंज़र की तरह वक़्फ़-ए-नज़र करना है
गुल-ए-नौख़ेज़ को तेशा भी बना दे या-रब
संगगुल-ए-लब-बस्ता के सीने में असर करना है
एक नेज़े पे लगाने हैं कई मेवा-ए-सर
एक टहनी को समर-दार शजर करना है
ग़ज़ल
जिस्म दीवार है दीवार में दर करना है
रफ़ीक राज़

