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जिस्म दीवार है दीवार में दर करना है | शाही शायरी
jism diwar hai diwar mein dar karna hai

ग़ज़ल

जिस्म दीवार है दीवार में दर करना है

रफ़ीक राज़

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जिस्म दीवार है दीवार में दर करना है
रूह इक ग़ार है इस ग़ार में घर करना है

एक ही क़तरा तो है अश्क-ए-नदामत का बहुत
कौन से दश्त-ओ-बयाबान को तर करना है

जलते रहना भी है दीवार पे फ़ानूस के बिन
बे-ज़ेरह मार्का-ए-बाद भी सर करना है

ख़ाक हो जाने पे ऐ ख़ाक-बसर क्यूँ हो ब-ज़िद
क्या तुम्हें दोश-ए-हवा पर भी सफ़र करना है

अब इन आँखों में वो दरिया कहाँ वो चश्मे कहाँ
चंद क़तरे हैं जिन्हें लाल-ओ-गुहर करना है

फ़तह-ए-गुलज़ार मुबारक हो मगर याद रहे
अभी ना-दीदा बयाबान भी सर करना है

कुछ तो है रंग सा एहसास के पर्दे में निहाँ
जिस को मंज़र की तरह वक़्फ़-ए-नज़र करना है

गुल-ए-नौख़ेज़ को तेशा भी बना दे या-रब
संगगुल-ए-लब-बस्ता के सीने में असर करना है

एक नेज़े पे लगाने हैं कई मेवा-ए-सर
एक टहनी को समर-दार शजर करना है