जिंस-ए-गिराँ थी ख़ूबी-ए-क़िस्मत नहीं मिली
बिकने को हम भी आए थे क़ीमत नहीं मिली
हंगाम-ए-रोज़-ओ-शब के मशाग़िल थे और भी
कुछ कारोबार ज़ीस्त से फ़ुर्सत नहीं मिली
कुछ दूर हम भी साथ चले थे कि यूँ हुआ
कुछ मसअलों पे उन से तबीअत नहीं मिली
इक आँच थी कि जिस से सुलगता रहा वजूद
शो'ला सा जाग उट्ठे वो शिद्दत नहीं मिली
वो बे-हिसी थी ख़ुश्क हुआ सब्ज़ा-ए-उमीद
बरसे जो सुब्ह-ओ-शाम-ओ-चाहत नहीं मिली
ख़्वाहिश थी जुस्तुजू भी थी दीवानगी न थी
सहरा-नवर्द बन के भी वहशत नहीं मिली
वो रौशनी थी साए भी तहलील हो गए
आईना-घर में अपनी भी सूरत नहीं मिली
ग़ज़ल
जिंस-ए-गिराँ थी ख़ूबी-ए-क़िस्मत नहीं मिली
शाहिद माहुली

