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जिगर को चाक कि दिल को लहू लहू कीजे | शाही शायरी
jigar ko chaak ki dil ko lahu lahu kije

ग़ज़ल

जिगर को चाक कि दिल को लहू लहू कीजे

मोहम्मद मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा

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जिगर को चाक कि दिल को लहू लहू कीजे
हयात को किसी उन्वान सुर्ख़-रू कीजे

नहीं है हौसला मर मर के ज़िंदा रहने का
तो कौन कहता है जीने की आरज़ू कीजे

है चाक चाक बहुत ज़िंदगी का पैराहन
ख़ुदा के वास्ते कुछ कोशिश-ए-रफ़ू कीजे

लहू से पहले गुलिस्ताँ को कीजिए सैराब
फिर उस के बा'द तमन्ना-ए-रंग-ओ-बू कीजे

तुम्हारी बज़्म में आई कहाँ से ये रौनक़
नज़र मिला के ज़रा हम से गुफ़्तुगू कीजे

ब-फ़ैज़-ए-इश्क़ तक़द्दुस-मआब हैं हम लोग
हमारा ज़िक्र भी कीजे तो बा-वज़ू कीजे

क़लम उठे तो रहे अज़्मत-ए-क़लम का ख़याल
ऐ 'मंशा' यूँही सदा हिफ़्ज़-ए-आबरू कीजे