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जवानी की हालत गुज़र जाएगी | शाही शायरी
jawani ki haalat guzar jaegi

ग़ज़ल

जवानी की हालत गुज़र जाएगी

मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही

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जवानी की हालत गुज़र जाएगी
चढ़ी है जो सर पर उतर जाएगी

जिधर को मिरी चश्म-ए-तर जाएगी
उधर काम दरिया का कर जाएगी

ज़माने की ईज़ा का शिकवा न कर
गुज़रते गुज़रते गुज़र जाएगी

खुलेगा तुझे इश्क़-बाज़ी का हाल
ये हिर्स-ए-हवा जबकि मर जाएगी

मिरे जिस्म-ए-ख़ाकी से हो के जुदा
ये रूह-ए-रवाँ फिर किधर जाएगी

मिरे नग़्मों से अंदलीब-ए-चमन
कहाँ उड़ के तू मुश्त-ए-पर जाएगी

तवज्जोह तिरी ओ बुत-ए-बेवफ़ा
मिरा काम आख़िर को कर जाएगी

बहार-ए-चमन जबकि होगी ख़िज़ाँ
मिरी वहशत-ए-दिल किधर जाएगी

अगर जज़्बा-ए-दिल पे क़ाबू रहा
शब-ए-वस्ल की फिर ठहर जाएगी

खिंची है जो तेग़-ए-मोहब्बत दिला
यही एक दिन तेरे सर जाएगी

चढ़ी होगी कच्चे घड़े की जिसे
उतरते उतरते उतर जाएगी

क़िमार-ए-मोहब्बत में गर आह की
ये जीती हुई बाज़ी हर जाएगी

मिरी मर्ग ऐसी है ऐ 'मुंतही'
कि जिस की अदम तक ख़बर जाएगी