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जल्वा-ए-हुस्न से है सूरत-ए-औक़ात नई | शाही शायरी
jalwa-e-husn se hai surat-e-auqat nai

ग़ज़ल

जल्वा-ए-हुस्न से है सूरत-ए-औक़ात नई

चरख़ चिन्योटी

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जल्वा-ए-हुस्न से है सूरत-ए-औक़ात नई
दिन दुनिया सुब्ह नई शाम नई रात नई

उन बदलते हुए हालात का मातम कैसा
हर नए दौर में बनती हैं रिवायात नई

हर मुलाक़ात का अंदाज़ नया होता है
जो भी होती है वो होती है मुलाक़ात नई

नया-पन हुस्न को विर्से में मिला हो जैसे
हर अदा उस की नई वज़्अ नई बात नई

चाँद-तारों में नया नूर उमडता है
'चर्ख़' वो आते हैं आती है नज़र रात नई