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जलने लगे ख़ला में हवाओं के नक़्श-ए-पा | शाही शायरी
jalne lage KHala mein hawaon ke naqsh-e-pa

ग़ज़ल

जलने लगे ख़ला में हवाओं के नक़्श-ए-पा

आदिल मंसूरी

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जलने लगे ख़ला में हवाओं के नक़्श-ए-पा
सूरज का हाथ शाम की गर्दन पे जा पड़ा

छत पर पिघल के जम गई ख़्वाबों की चाँदनी
कमरे का दर्द हाँपते सायों को खा गया

बिस्तर में एक चाँद तराशा था लम्स ने
उस ने उठा के चाय के कप में डुबो दिया

हर आँख में थी टूटते लम्हों की तिश्नगी
हर जिस्म पे था वक़्त का साया पड़ा हुआ

देखा था सब ने डूबने वाले को दूर दूर
पानी की उँगलियों ने किनारे को छू लिया

आएगी रात मुँह पे सियाही मले हुए
रख देगा दिन भी हाथ में काग़ज़ फटा हुआ