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जहाँ बचपन गुज़ारा था वो घर पहचानते हैं | शाही शायरी
jahan bachpan guzara tha wo ghar pahchante hain

ग़ज़ल

जहाँ बचपन गुज़ारा था वो घर पहचानते हैं

मुनव्वर हाशमी

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जहाँ बचपन गुज़ारा था वो घर पहचानते हैं
अभी हम शहर की हर रहगुज़र पहचानते हैं

परिंदे जिस तरफ़ जाएँ पलट आते हैं शब को
वो अपना आशियाँ अपना शजर पहचानते हैं

अभी गलियाँ नहीं भूलें मिरे क़दमों की आहट
मुझे इस शहर के दर-ओ-दीवार पहचानते हैं

कभी मेरे हवाले से रही पहचान जिन की
मुझे वो पास आ कर सोच कर पहचानते हैं

नहीं पहचानते कुछ लोग दुनिया में तो क्या है
मिरे फ़न को सभी अहल-ए-नज़र पहचानते हैं

जो आँखें रौज़नों से झाँकती थीं अब नहीं हैं
घरों के बंद दरवाज़े मगर पहचानते हैं

'मुनव्वर' हम ने यूँ इस शहर की चीज़ों को देखा
मुसाफ़िर जैसे सामान-ए-सफ़र पहचानते हैं