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जग है मुश्ताक़ पिव के दर्शन का | शाही शायरी
jag hai mushtaq piw ke darshan ka

ग़ज़ल

जग है मुश्ताक़ पिव के दर्शन का

दाऊद औरंगाबादी

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जग है मुश्ताक़ पिव के दर्शन का
किस कूँ नीं एहतियाज दर्पन का

साफ़ दिल है जो आरसी मानिंद
नित है हैराँ जमाल-ए-रौशन का

गरचे होना है ऐब-पोशी जहाँ
कस्ब कर इख़्तियार सोज़न का

क्यूँ न हुए आशिक़ी में ख़ौफ़ रक़ीब
हर सफ़र में ख़तर है रहज़न का

ज़ोहद-ए-ज़ाहिद है ख़ौफ़-ए-महशर सूँ
ताब नामर्द कूँ कहाँ रन का

ख़ाक हो यार की गली मत छोड़
गरचे कुछ मुद्दआ है दामन का

सब्र कर हिज्र में तूँ ऐ 'दाऊद'
देखना है अगर सिरीजन का