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जब तक कि तिरी गालियाँ खाने के नहीं हम | शाही शायरी
jab tak ki teri galiyan khane ke nahin hum

ग़ज़ल

जब तक कि तिरी गालियाँ खाने के नहीं हम

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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जब तक कि तिरी गालियाँ खाने के नहीं हम
उठ कर तिरे दरवाज़े से जाने के नहीं हम

जितना कि ये दुनिया में हमें ख़्वार रखे है
इतने तो गुनहगार ज़माने के नहीं हम

हो जावेंगे पामाल गुज़र जावेंगे जी से
पर सर तिरे क़दमों से उठाने के नहीं हम

आने दो उसे जिस के लिए चाक किया है
नासेह से गरेबाँ को सिलाने के नहीं हम

जब तक कि न छिड़केगा गुलाब आप वो आ कर
इस ग़श से कभी होश में आने के नहीं हम

जावेंगे सबा बाग़ में गुल-गश्त-ए-चमन को
पर तेरी तरह ख़ाक उड़ाने के नहीं हम

ऐ 'मुसहफ़ी' ख़ुश होने का नहीं हम से वो जब तक
सर काट के नज़्र उस को भिजाने के नहीं हम