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जब नबी-साहिब में कोह-ओ-दश्त से आई बसंत | शाही शायरी
jab nabi-sahib mein koh-o-dasht se aai basant

ग़ज़ल

जब नबी-साहिब में कोह-ओ-दश्त से आई बसंत

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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जब नबी-साहिब में कोह-ओ-दश्त से आई बसंत
कर के मुजरा शाह-ए-मर्दां की तरफ़ धाई बसंत

ख़्वाजा-क़ुतबुद्दीं में फिर गड़वा बना कर ले गई
या'नी उन की नज़्र को सौ फूल गुल लाई बसंत

वाँ से फिर हज़रत-निज़ामुद्दीं की ख़िदमत में चली
तुर्बत-ए-ख़ुसरव पे फिर हो के खड़े गाई बसंत

सू-ए-हज़रत तुर्कमाँ आई जो कर उस का तवाफ़
हो गई वोहीं बयाबानी-ओ-सहराई बसंत

वोहीं फिर दरबार-ए-शाह-ए-हिन्द में रख कर क़दम
नाचने गाने लगी हँस हँस ब-ज़ेबाई बसंत

फिर जनाब आसिफ़-ए-दौराँ में बा-सद ऐश-ओ-नाज़
हो गई आ कर के मसरूफ़-ए-जबीं-साई बसंत

'मुसहफ़ी' अब इक ग़ज़ल लिख तू ग़ज़ल की तरह से
ता करे आलम का ताराज-ए-शकेबाई बसंत