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जान ओ दिल सीं मैं गिरफ़्तार हूँ किन का उन का | शाही शायरी
jaan o dil sin main giraftar hun kin ka un ka

ग़ज़ल

जान ओ दिल सीं मैं गिरफ़्तार हूँ किन का उन का

सिराज औरंगाबादी

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जान ओ दिल सीं मैं गिरफ़्तार हूँ किन का उन का
बंदा-ए-बे-ज़र-ओ-दीनार हूँ किन का उन का

सब्र के बाग़ के मंडवे से झड़ा हूँ जियूँ फूल
अब तो लाचार गले हार हूँ किन का उन का

हौज़-ए-कौसर की नहीं चाह-ए-ज़नख़दाँ की क़सम
तिश्ना-ए-शर्बत-ए-दीदार हूँ किन का उन का

लब-ओ-रुख़्सार के गुल-क़ंद सीं लाज़िम है इलाज
दिल के आज़ार सीं बीमार हूँ किन का उन का

मुद्दतें हुईं कि हुआ ख़ाना-ए-ज़ंजीर ख़राब
बस्ता-ए-ज़ुल्फ़-ए-गिरह-दार हूँ किन का उन का

तिश्ना-ए-मर्ग कूँ है आब-ए-सुराही दम-ए-तेग़
बिस्मिल-ए-अबरू-ए-ख़मदार हूँ किन का उन का

नाहक़ इस संग-दिली सीं मुझे देते हैं शिकस्त
मैं तो आईना-ए-सरकार हूँ किन का उन का

गुलशन-ए-वस्ल में रहता हूँ ग़ज़ल-ख़्वान-ए-फ़िराक़
अंदलीब-ए-गुल-ए-रुख़्सार हूँ किन का उन का

मैं कहा रहम पतंगों पे कर ऐ जान-ए-'सिराज'
तब कहा शम्-ए-शब-तार हूँ किन का उन का