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जान जाए अगर तो जाने दे | शाही शायरी
jaan jae agar to jaane de

ग़ज़ल

जान जाए अगर तो जाने दे

मोहसिन असरार

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जान जाए अगर तो जाने दे
अपनी तस्वीर तो बनाने दे

आख़िर ऐसी भी क्या है हद-बंदी
हाथ को हाथ तक तो आने दे

एक ही आग का बुझाना क्या
दूसरी आग भी लगाने दे

क्या ज़रूरी है ख़ुद को खोया जाए
पा रहा हूँ तुझे सो पाने दे

दस्तकें क्यूँ हवा पे देता है
दर-ओ-दीवार तो बनाने दे

मैं नया पैरहन बदल दूँगा
दाग़ आता है अब तो आने दे

ज़िंदगी तो हमें पसंद आई
अब हमें अपने घर भी जाने दे

तेरी ज़ुल्फ़ों में तीरगी है बहुत
ला मुझे रौशनी बनाने दे

रास्ता गर नहीं तो फिर 'मोहसिन'
मुझ को बे-रास्ता ही जाने दे