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जाम गर्दिश में है दर-बंद हैं मय-ख़ानों के | शाही शायरी
jam gardish mein hai dar-band hain mai-KHanon ke

ग़ज़ल

जाम गर्दिश में है दर-बंद हैं मय-ख़ानों के

शकील बदायुनी

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जाम गर्दिश में है दर-बंद हैं मय-ख़ानों के
कुछ फ़रिश्ते हैं यहाँ रूप में इंसानों के

शम्अ' की आग में दिल जलते हैं परवानों के
हौसले देखिए इन सोख़्ता-सामानों के

सिर्फ़ तश्हीर है शायद मिरा अफ़्साना-ए-ग़म
आज अहबाब में अंदाज़ हैं बेगानों के

लज़्ज़त-ए-ख़्वाब से बेगाना हैं माह-ओ-अंजुम
सुनने वाले हैं ये शायद मिरे अफ़्सानों के

फ़स्ल-ए-गुल रंग-ए-चमन दौर-ए-ख़िज़ाँ हुस्न-ए-बहार
मुख़्तलिफ़ नाम हैं साक़ी तिरे पैमानों के

ऐ मिरे नासेह-ए-ख़ुश-फ़हम ज़रा ग़ौर से सुन
दोस्त नादान हुआ करते हैं नादानों के

चुन लिया है जिन्हें गर्दूं ने समझ कर तारे
हैं 'शकील' आह ये टुकड़े मिरे अरमानों के