जा-ब-जा आग बिछाई थी कभी
अपने बस में भी ख़ुदाई थी कभी
मेरे आईने में ख़ुद मेरे सिवा
कोई सूरत नज़र आई थी कभी
दुश्मनों से भी था याराना मिरा
दोस्तों से भी लड़ाई थी कभी
रंग चुभते हैं जो अब आँखों में
अपनी तस्वीर बनाई थी कभी
जब से हैं अपने पराए बेज़ार
रस्म दुनिया की उठाई थी कभी
हम ने भी दश्त को महकाया है
हम ने भी ख़ाक उड़ाई थी कभी
खोद कर ज़ेर-ए-ज़मीं कुछ न मिला
अपनी शमशीर छुपाई थी कभी
अब दहकती है दोबारा 'हमदम'
आग सीने में दबाई थी कभी
ग़ज़ल
जा-ब-जा आग बिछाई थी कभी
हमदम कशमीरी

