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इतना ही नहीं है कि तिरे बिन न रहा जाए | शाही शायरी
itna hi nahin hai ki tere bin na raha jae

ग़ज़ल

इतना ही नहीं है कि तिरे बिन न रहा जाए

शानुल हक़ हक़्क़ी

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इतना ही नहीं है कि तिरे बिन न रहा जाए
वो जाँ पे बनी है कि जिए बिन न रहा जाए

अब दस्तरस-ए-शौक़ है बस नाम तक उस के
अक्सर जिसे सौ तरह लिखे बिन न रहा जाए

ग़म-बुर्दा सही ग़ुंचा-ए-अफ़्सुर्दा सही दिल
तुम प्यार से देखो तो खिले बिन न रहा जाए

है दिल ही वो नादाँ कि हो तदबीर से नौमीद
और फिर कोई तदबीर किए बिन न रहा जाए

उफ़्ताद में कुछ सई-ए-मतानत नहीं चलती
रोने को जो रोकें तो हँसे बिन न रहा जाए

हम वो हैं कि सद-का'बा ओ सद-दैर के होते
गोशा कोई ता'मीर किए बिन न रहा जाए

कुछ देर गुज़रती है कि ऐ बुलबुल-ए-नाशाद
सय्याद से नख़चीर हुए बिन न रहा जाए

हर चंद कि फ़ुर्क़त में तिरी ज़हर हो जीना
कुछ क़हर है ऐसा कि जिए बिन न रहा जाए