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इस नाज़नीं की बातें क्या प्यारी प्यारियाँ हैं | शाही शायरी
is naznin ki baaten kya pyari pyariyan hain

ग़ज़ल

इस नाज़नीं की बातें क्या प्यारी प्यारियाँ हैं

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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इस नाज़नीं की बातें क्या प्यारी प्यारियाँ हैं
पलकें हैं जिस की छुरियाँ आँखें कटारियाँ हैं

इस बात पर भला हम क्यूँकर न ज़हर खावें
हम से वही रुकावट ग़ैरों से यारियाँ हैं

टुक सफ़्हा-ए-ज़मीं के ख़ाके पे ग़ौर कर तू
सानेअ' ने इस पे क्या क्या शक्लें अतारियाँ हैं

दिल की तपिश का अपनी आलम ही कुछ जुदा है
सीमाब ओ बर्क़ में कब ये बे-क़रारियाँ हैं

उन महमिलों पे आवे मजनूँ को क्यूँ न हसरत
जिन महमिलों के अंदर दो दो सवारियाँ हैं

जागा है रात प्यारे तू किस के घर जो तेरी
पलकें नदीदियाँ हैं आँखें ख़ुमारियाँ हैं

नौमीद हैं ब-ज़ाहिर गो वस्ल से हम उस के
दिल में तो सौ तरह की उम्मीदवारियाँ हैं

क्या पूछता है हमदम अहवाल 'मुसहफ़ी' का
रातें अंधेरियाँ और अख़्तर-शुमारियाँ हैं