इस मर्ग को कब नहीं मैं समझा
हर दम दम-ए-वापसीं मैं समझा
अंदाज़ तिरा बस अब न कर शोर
ऐ नाला-ए-आतिशीं मैं समझा
तब मुझ को अजल हुई गवारा
जब ज़हर को अंग्बीं मैं समझा
इक ख़ल्क़ की सरनविश्त बाँची
अपना न ख़त-ए-जबीं मैं समझा
जूँ शाना कभू तह-ए-पेँच तेरे
ऐ काकुल-ए-अम्बरीं मैं समझा
क्या फ़ाएदा आह-ए-दम-ब-दम से
है दर्द-ए-दिल-ए-हज़ीं मैं समझा
फिर इस में न शक ने राह पाई
जिस बात को बिल-यक़ीं मैं समझा
जब उठ गई ज़िद तो हर सुख़न में
समझा तो कहीं कहीं मैं समझा
मू-ए-कमर उस का क्या है ऐ अक़्ल
समझा तू मुझे नहीं मैं समझा
लिक्खी ग़ज़ल इस में 'मुसहफ़ी' जल्द
जिस को कि नई ज़मीं मैं समझा
ग़ज़ल
इस मर्ग को कब नहीं मैं समझा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

