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इस मर्ग को कब नहीं मैं समझा | शाही शायरी
is marg ko kab nahin main samjha

ग़ज़ल

इस मर्ग को कब नहीं मैं समझा

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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इस मर्ग को कब नहीं मैं समझा
हर दम दम-ए-वापसीं मैं समझा

अंदाज़ तिरा बस अब न कर शोर
ऐ नाला-ए-आतिशीं मैं समझा

तब मुझ को अजल हुई गवारा
जब ज़हर को अंग्बीं मैं समझा

इक ख़ल्क़ की सरनविश्त बाँची
अपना न ख़त-ए-जबीं मैं समझा

जूँ शाना कभू तह-ए-पेँच तेरे
ऐ काकुल-ए-अम्बरीं मैं समझा

क्या फ़ाएदा आह-ए-दम-ब-दम से
है दर्द-ए-दिल-ए-हज़ीं मैं समझा

फिर इस में न शक ने राह पाई
जिस बात को बिल-यक़ीं मैं समझा

जब उठ गई ज़िद तो हर सुख़न में
समझा तो कहीं कहीं मैं समझा

मू-ए-कमर उस का क्या है ऐ अक़्ल
समझा तू मुझे नहीं मैं समझा

लिक्खी ग़ज़ल इस में 'मुसहफ़ी' जल्द
जिस को कि नई ज़मीं मैं समझा