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इस गोशा-ए-उज़्लत में तन्हाई है और मैं हूँ | शाही शायरी
is gosha-e-uzlat mein tanhai hai aur main hun

ग़ज़ल

इस गोशा-ए-उज़्लत में तन्हाई है और मैं हूँ

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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इस गोशा-ए-उज़्लत में तन्हाई है और मैं हूँ
माशूक़-ए-तसव्वुर से यकजाई है और मैं हूँ

या घर से क़दम मेरा बाहर न निकलता था
या शहर की गलियों में रुस्वाई है और मैं हूँ

जिस दश्त में नाक़े का गुज़रा न क़दम हरगिज़
उस दश्त में मजनूँ सा सौदाई है और मैं हूँ

नासेह की न मैं मानूँ हमदम की न कुछ समझूँ
इस इश्क़-ओ-मोहब्बत में ख़ुद-आराई है और मैं हूँ

हर-चंद जुनून-ए-इश्क़ होता है ख़िरद-दुश्मन
ऐ 'मुसहफ़ी' इस पर भी दानाई है और मैं हूँ