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इंक़लाब एक ख़्वाब है सो है | शाही शायरी
inqalab ek KHwab hai so hai

ग़ज़ल

इंक़लाब एक ख़्वाब है सो है

जौन एलिया

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इंक़लाब एक ख़्वाब है सो है
दिल की दुनिया ख़राब है सो है

रहियो तो यूँही महव-ए-आराइश
बाहर इक इज़्तिराब है सो है

तर है दश्त उस के अक्स-ए-मंज़र से
और ख़ुद वो सराब है सो है

जो भी दश्त-ए-तलब का है पस-ए-रू
वही ज़र्रीं-रिकाब है सो है

शैख़ साहब लिए फिरें तेग़ा
बरहमन फ़त्ह-याब है सौ है

दहर आशोब है सवालों का
और ख़ुदा ला-जवाब है सो है

इस शब-ए-तीरा-ए-हमेशा में
रौशनी एक ख़्वाब है सो है