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इक तुम कि हो बे-ख़बर सदा के | शाही शायरी
ek tum ki ho be-KHabar sada ke

ग़ज़ल

इक तुम कि हो बे-ख़बर सदा के

अय्यूब ख़ावर

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इक तुम कि हो बे-ख़बर सदा के
मौसम है कि हाथ मल रहा है

ज़ाहिर में सबा-ख़िराम ख़ुशबू
बातिन में निफ़ाक़ पल रहा है

ऐ लज़्ज़त-ए-हिज्र याद रखना
ये लम्हा-ए-वस्ल खल रहा है

आईने में अक्स ढल रहा है
पानी में चराग़ जल रहा है

आँखों में ग़ुबार मंज़िलों का
क़दमों में सराब चल रहा है

जैसे कोई याद आ रहा हो
आँखों में नशा पिघल रहा है

हम उस के मिज़ाज-आश्ना हैं
जो बात का रुख़ बदल रहा है