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इधर मौसम की ये ख़ुश-एहतिमामी | शाही शायरी
idhar mausam ki ye KHush-e-ehtimami

ग़ज़ल

इधर मौसम की ये ख़ुश-एहतिमामी

शानुल हक़ हक़्क़ी

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इधर मौसम की ये ख़ुश-एहतिमामी
उधर रिंदों की ये हसरत-बजामी

हवाएँ चल रही हैं सनसनाती
घटाएँ उठ रहीं हैं धूम-धामी

ये है अक्स-ए-हिलाल ऐ मौज-ए-साहिल
कि शमशीर-ए-बदन की बे-नियामी

फड़कता जा मिसाल-ए-बाल-ए-जिब्रील
न चुप हो ऐ दिल ऐ मेरे पयामी

खुले हैं पाँच दर इक सम्त-ए-दरिया
नविश्ते में यहीं थी एक ख़ामी

बहुत है अर्श पर दम भर का फेरा
नहीं भाती हमें क़ैद-ए-मक़ामी

नहीं है चश्म-ए-फ़ितरत में कोई फूल
ज़मीं की कोख का जाया हरामी

सुना दो उन को ये भी क़ौल-ए-'हक़्क़ी'
अभी तक सोच में जिन की है ख़ामी