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हुक्म आया है कि फ़ित्ने को भी फ़ित्ना न कहूँ | शाही शायरी
hukm aaya hai ki fitne ko bhi fitna na kahun

ग़ज़ल

हुक्म आया है कि फ़ित्ने को भी फ़ित्ना न कहूँ

कर्रार नूरी

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हुक्म आया है कि फ़ित्ने को भी फ़ित्ना न कहूँ
जैसा देखा है सुना है उसे वैसा न कहूँ

मेरे चुप रहने से क्या बात सँवर जाएगी
लोग ख़ुद भी तो समझते हैं कहूँ या न कहूँ

हुस्न ग़म्ज़े से छुटा इश्क़ फ़रामोश हुआ
ऐसे हालात में क्या शे'र भी सच्चा न कहूँ

ख़ुद-कुशी और शहादत में है इक फ़र्क़-ए-लतीफ़
काश जो कुछ मुझे कहना है वो तन्हा न कहूँ

किस क़दर ज़ुल्म है हालात का 'नूरी' साहब
आप धोका मुझे दें और मैं धोका न कहूँ