हुक्म आया है कि फ़ित्ने को भी फ़ित्ना न कहूँ
जैसा देखा है सुना है उसे वैसा न कहूँ
मेरे चुप रहने से क्या बात सँवर जाएगी
लोग ख़ुद भी तो समझते हैं कहूँ या न कहूँ
हुस्न ग़म्ज़े से छुटा इश्क़ फ़रामोश हुआ
ऐसे हालात में क्या शे'र भी सच्चा न कहूँ
ख़ुद-कुशी और शहादत में है इक फ़र्क़-ए-लतीफ़
काश जो कुछ मुझे कहना है वो तन्हा न कहूँ
किस क़दर ज़ुल्म है हालात का 'नूरी' साहब
आप धोका मुझे दें और मैं धोका न कहूँ
ग़ज़ल
हुक्म आया है कि फ़ित्ने को भी फ़ित्ना न कहूँ
कर्रार नूरी

