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हुजूम-ए-यास में जीना भी इक अज़ाब हुआ | शाही शायरी
hujum-e-yas mein jina bhi ek azab hua

ग़ज़ल

हुजूम-ए-यास में जीना भी इक अज़ाब हुआ

बख़्तियार ज़िया

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हुजूम-ए-यास में जीना भी इक अज़ाब हुआ
यही हुआ कि मोहब्बत में दिल ख़राब हुआ

छुपा हुआ है जो चेहरा हया के दामन में
न कोई आईना उस हुस्न का जवाब हुआ

बहम उलझते रहे शैख़-ओ-बरहमन अब तक
जो हम उठे तो ज़माने में इंक़लाब हुआ

तुम्हारे हुक्म पे हस्ती मिटा चुके हम तो
मगर हमारी वफ़ाओं का क्या जवाब हुआ

मिरी नवा से लरज़ने लगा निज़ाम-ए-कोहन
मिरा पयाम 'ज़िया' वज्ह-ए-इंक़लाब हुआ