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हुजूम-ए-हम-नफसाँ चारा-ए-अलम न हुआ | शाही शायरी
hujum-e-ham-nafsan chaara-e-alam na hua

ग़ज़ल

हुजूम-ए-हम-नफसाँ चारा-ए-अलम न हुआ

मुशफ़िक़ ख़्वाजा

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हुजूम-ए-हम-नफसाँ चारा-ए-अलम न हुआ
कि इस तरह ग़म-ए-तन्हा-रवी तो कम न हुआ

न पूछ दश्त-ए-तलब में मता-ए-दामन-ए-ज़ीस्त
ये तार तार तो होता रहा प नम न हुआ

लिखी गई हैं जुनूँ की हिकायतें क्या क्या
मगर वो क़िस्सा-ए-ग़म जो कभी रक़म न हुआ

मिली न आबला-पायान-ए-शौक़ को मंज़िल
कि फ़ासलों की तरह हौसला भी कम न हुआ

रह-ए-तलब में है आसूदा-हाल मौज-ब-जिस्म
ख़ुदा ख़ुदा ही रहा और सनम सनम न हुआ

वो कौन हैं कि हवस रास आ गई है जिन्हें
यहाँ तो इश्क़ भी चारा-गर-ए-अलम न हुआ

गुमाँ हुआ मुझे एहसान-ए-ना-शनासी का
जो ख़ुद-बख़ुद कोई आमादा-ए-सितम न हुआ