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हो गई शहर शहर रुस्वाई | शाही शायरी
ho gai shahr shahr ruswai

ग़ज़ल

हो गई शहर शहर रुस्वाई

मीर तक़ी मीर

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हो गई शहर शहर रुस्वाई
ऐ मिरी मौत तू भली आई

यक बयाबाँ ब-रंग-ए-सौत-ए-जरस
मुझ पे है बे-कसी-ओ-तन्हाई

न खिंचे तुझ से एक जा नक़्क़ाश
उस की तस्वीर वो है हरजाई

सर रखूँ उस के पाँव पर लेकिन
दस्त-ए-क़ुदरत ये मैं कहाँ पाई

'मीर' जब से गया है दिल तब से
मैं तो कुछ हो गया हूँ सौदाई