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हिकायात-ए-लब-ओ-रुख़्सार से आगे नहीं जाते | शाही शायरी
hikayat-e-lab-o-ruKHsar se aage nahin jate

ग़ज़ल

हिकायात-ए-लब-ओ-रुख़्सार से आगे नहीं जाते

क़तील शिफ़ाई

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हिकायात-ए-लब-ओ-रुख़्सार से आगे नहीं जाते
वो नग़्मे जो तुम्हारे प्यार से आगे नहीं जाते

कमंदें डालने आए थे जो बाम-ए-सुरय्या पर
वही अब साया-ए-दीवार से आगे नहीं जाते

गदा-ए-ज़ात क्या जानें नवा-ए-काएनात ऐ दिल
ये वो मंसूर हैं जो दार से आगे नहीं जाते

बड़ी हिम्मत दिखाएँगे तो साहिल छोड़ जाएगा
हमारे नाख़ुदा मंजधार से आगे नहीं जाते

अजब अहल-ए-समाअत हैं जो ज़ंजीरों से घबरा कर
तिरी पाज़ेब की झंकार से आगे नहीं जाते

मुरत्तब जिन को अपनी आबला-पाई नहीं करती
वो अफ़्साने गुल-ओ-गुलज़ार से आगे नहीं जाते