EN اردو
हवस को है नशात-ए-कार क्या क्या | शाही शायरी
hawas ko hai nashat-e-kar kya kya

ग़ज़ल

हवस को है नशात-ए-कार क्या क्या

मिर्ज़ा ग़ालिब

;

हवस को है नशात-ए-कार क्या क्या
न हो मरना तो जीने का मज़ा क्या

तजाहुल-पेशगी से मुद्दआ क्या
कहाँ तक ऐ सरापा नाज़ क्या क्या

नवाज़िश-हा-ए-बेजा देखता हूँ
शिकायत-हा-ए-रंगीं का गिला क्या

निगाह-ए-बे-महाबा चाहता हूँ
तग़ाफ़ुल-हा-ए-तमकीं-आज़मा क्या

फ़रोग़-ए-शोला-ए-ख़स यक-नफ़स है
हवस को पास-ए-नामूस-ए-वफ़ा क्या

नफ़स मौज-ए-मुहीत-ए-बे-ख़ुदी है
तग़ाफ़ुल-हा-ए-साक़ी का गिला क्या

दिमाग़-ए-इत्र-ए-पैराहन नहीं है
ग़म-ए-आवारगी-हा-ए-सबा क्या

दिल-ए-हर-क़तरा है साज़-ए-अनल-बहर
हम उस के हैं हमारा पूछना क्या

मुहाबा क्या है मैं ज़ामिन इधर देख
शहीदान-ए-निगह का ख़ूँ-बहा क्या

सुन ऐ ग़ारत-गर-ए-जिंस-ए-वफ़ा सुन
शिकस्त-ए-क़ीमत-ए-दिल की सदा क्या

किया किस ने जिगर-दारी का दावा
शकीब-ए-ख़ातिर-ए-आशिक़ भला क्या

ये क़ातिल वादा-ए-सब्र-आज़मा क्यूँ
ये काफ़िर फ़ित्ना-ए-ताक़त-रुबा क्या

बला-ए-जाँ है 'ग़ालिब' उस की हर बात
इबारत क्या इशारत क्या अदा क्या