हवास-ओ-हाफ़िज़े का मान रह गया है बस
कहाँ की याद तिरा ध्यान रह गया है बस
तमाम लश्कर-ए-अक़्ल-ओ-निगाह खेत रहा
बिसात-ए-इश्क़ पे सुल्तान रह गया है बस
वो और हैं कि जो ग़म को ग़लत भी करते हैं
ये दिल तो हिज्र से हैरान रह गया है बस
ख़दंग-ए-ख़्वाब तुझे दिल में ले के बैठ रहूँ
मिरे लिए यही आसान रह गया है बस
विरासतों के सब एहसास गुम हुए 'अरशद'
मिरी नजात को ईमान रह गया है बस
ग़ज़ल
हवास-ओ-हाफ़िज़े का मान रह गया है बस
अरशद अब्दुल हमीद

