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हरीम-ए-हुस्न से आँखों के राब्ते रखना | शाही शायरी
harim-e-husn se aankhon ke rabte rakhna

ग़ज़ल

हरीम-ए-हुस्न से आँखों के राब्ते रखना

अय्यूब ख़ावर

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हरीम-ए-हुस्न से आँखों के राब्ते रखना
तमाम उम्र तहय्युर के दर खुले रखना

हिसार-ए-आईना-ओ-ख़्वाब से निकलने तक
शिकस्त-ए-ज़ात का मंज़र सँभाल के रखना

ये बारगाह-ए-मोहब्बत है मेरी ख़ल्वत है
मिरे हरीफ़ क़दम एहतियात से रखना

फ़राज़-ए-कोह-ए-शब-ए-ग़म से देखना है उसे
मिरे ख़ुदा मिरी क़िस्मत में रत-जगे रखना

गिरा दिया जिसे इक बार अपनी नज़रों से
फिर उस को ख़्वाब की हद से भी कुछ परे रखना