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हर रोज़ हमें घर से सहरा को निकल जाना | शाही शायरी
har roz hamein ghar se sahra ko nikal jaana

ग़ज़ल

हर रोज़ हमें घर से सहरा को निकल जाना

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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हर रोज़ हमें घर से सहरा को निकल जाना
खेतों का मज़ा लेना जंगल को निकल जाना

जी क्यूँ न भला उन की फिर भौं पे लगे अपना
इक वुसअत-ए-मशरब के है साथ ये वीराना

सत्ह पे ज़मीं की है ता-हद्द-ए-नज़र सब्ज़ा
क्या सैर का आलम है अपना है न बेगाना

हम इश्क़-ए-हक़ीक़ी के ये रंग समझते हैं
ने लैला न मजनूँ है ने शम्अ' न परवाना

जिस हुस्न के जल्वे हैं आरिफ़ की निगाहों में
वो हुस्न बनावे है का'बे को सनम-ख़ाना

दीवाना-ए-शहरी तो दीवार का साया ले
साए में मुग़ीलाँ के बैठेगा ये दीवाना

ग़ुर्बत के बयाबाँ में है 'मुसहफ़ी' आवारा
ऐ ख़िज़्र-ए-ख़जिस्ता पे टुक राह तू बतलाना