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हर इक माहौल से बेगानगी महसूस होती है | शाही शायरी
har ek mahaul se beganagi mahsus hoti hai

ग़ज़ल

हर इक माहौल से बेगानगी महसूस होती है

ऋषि पटियालवी

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हर इक माहौल से बेगानगी महसूस होती है
कहीं अपनी कहीं तेरी कमी महसूस होती है

अभी से क्यूँ जुदाई की अज़िय्यत का करें शिकवा
अभी दिल में तिरी मौजूदगी महसूस होती है

मोहब्बत का करिश्मा कोई देखे तेरे कूचे में
खुले बंदों यहाँ लुट कर ख़ुशी महसूस होती है

तिरे इरशाद-ए-बे-आवाज़ को जब दिल से सुनता हूँ
ख़मोशी गुफ़्तुगू करती हुई महसूस होती है

तसल्लुत है अभी जोश-ए-जुनूँ पर होश-मंदी का
अभी दीवानगी दीवानगी महसूस होती है

उन्हें पा कर भी रहता है तजस्सुस का वही आलम
कोई शय जिस तरह खोई हुई महसूस होती है

तलाश अपनी है या उन की कुछ अंदाज़ा नहीं होता
बसा-औक़ात यूँ आवारगी महसूस होती है

तिरी नज़रों का नश्तर तो ब-रू-ए-कार है लेकिन
मोहब्बत की ख़लिश में क्यूँ कमी महसूस होती है

ये माना अज्नबिय्यत की फ़ज़ा है बज़्म-ए-आलम में
मगर हर शक्ल पहचानी हुई महसूस होती है

किसी को देख कर यारब ये अब क्या देखता हूँ मैं
नज़र अनवार में खोई हुई महसूस होती है

नहीं होते तो होती हैं 'रिशी' तारीकियाँ दिल में
वो होते हैं तो दिल में रौशनी महसूस होती है